आगरा लाईव न्यूज। किरावली क्षेत्र के महुअर गांव में शराब के ठेकों पर हुआ बवाल अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासन, आबकारी विभाग और शासन की कथनी-करनी के बीच खाई को बेनकाब करता एक ज्वलंत सवाल बन गया है। जिन महिलाओं के नाम पर मिशन शक्ति जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, उन्हीं महिलाओं पर आज मुकदमे दर्ज हैं, जेल भेजा जा रहा है, जबकि शराब के ठेके—जो पूरे बवाल की जड़ बताए जा रहे हैं—ज्यों के त्यों चल रहे हैं। महुअर गांव में अंग्रेजी, देशी और कंपोजिट बीयर के ठेकों पर 30 से 40 महिला-पुरुषों की भीड़ के टूट पड़ने की घटना को पुलिस ने “तोड़फोड़ और लूटपाट” बताया, लेकिन गांव की सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा कड़वी है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि ठेका खुलने के बाद गांव का माहौल पूरी तरह बिगड़ गया था। रोज़ शराब पीकर लौटते पति, घरों में मारपीट, बच्चों के सामने गाली-गलौज और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार—यह सब उनकी दिनचर्या बन चुका था। कई बार पुलिस और आबकारी विभाग से शिकायतें की गईं, लेकिन हर बार आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ठेकेदार पर समय से पहले और समय के बाद शराब बेचने के आरोप लगे, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
खबरी सिस्टम से जुड़े होने के बावजूद ठेकेदार का न तो लाइसेंस निलंबित हुआ, न कोई सख्त कदम उठाया गया। कानून शराब बेचने वालों के लिए नरम और शराब से त्रस्त महिलाओं के लिए कठोर क्यों हो गया? घटना के दिन महिलाओं का सब्र आखिरकार टूट गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, गुस्से में भरी महिलाएं और कुछ युवक लाठी-डंडे लेकर ठेके पर पहुंचे। शराब की बोतलें बाहर निकालकर फोड़ी गईं, दुकानों में तोड़फोड़ हुई और गल्ले से 22,840 रुपये लूटने का आरोप भी सामने आया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 40 अज्ञात महिला-पुरुषों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और तीन लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पूरी घटना केवल “अपराध” थी या वर्षों से दबे आक्रोश का विस्फोट?
अब कहानी में एक नया मोड़ जोड़ दिया गया है—“साज़िश” का। दबी ज़ुबान में यह चर्चा है कि पड़ोसी गांव का एक युवक ठेकेदार से रंगदारी वसूलना चाहता था। बात न बनने पर उसने महिलाओं को भड़काकर हमला कराया। यदि यह सच है, तो फिर जांच का केंद्र उस युवक और ठेकेदार के गठजोड़ पर क्यों नहीं है? क्यों जांच का पहला और सबसे आसान निशाना वही महिलाएं बनीं, जो शराब के दुष्परिणाम झेल रही थीं? आबकारी निरीक्षक का यह कहना कि “अगर परेशानी थी तो शिकायत करनी चाहिए थी” सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करता है। क्या शिकायतें पहले नहीं हुईं? क्या आबकारी विभाग ने कभी गांव आकर महिलाओं से बात की? और अगर हिंसा गलत है, तो क्या शराब के कारण टूटते घर, बिगड़ता सामाजिक ताना-बाना और बच्चों का भविष्य कोई अपराध नहीं?
मिशन शक्ति के पोस्टर, मंचों से भाषण और फाइलों में योजनाएं—सब कुछ चल रहा है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि जिन महिलाओं ने शराब के खिलाफ आवाज़ उठाई, वे आज आरोपी हैं। उनके बच्चे घर पर रो रहे हैं, परिवार टूट रहा है और शराब ठेकेदार बेखौफ अपने धंधे में जुटा है। किरावली की यह घटना चेतावनी है। अगर प्रशासन ने इसे केवल “कानून-व्यवस्था की समस्या” मानकर दबाने की कोशिश की, तो ऐसे विस्फोट फिर होंगे। असली सवाल अब भी वही है—क्या महिलाओं का आक्रोश अपराध है, या शराब को संरक्षण देने वाली व्यवस्था असली गुनहगार?
जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, तब तक मिशन शक्ति सिर्फ एक नारा ही रहेगा।

