आगरा लाईव न्यूज। ताजनगरी आगरा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती। चंबल की उफनती धारा में जब एक किसान की जिंदगी मगरमच्छ के जबड़ों में फंस गई, तब वहां मौजूद 9–10 साल का एक मासूम बालक मौत के सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। वही बालक आज पूरे देश का गौरव बन चुका है। मगरमच्छ से भिड़कर अपने पिता के प्राण बचाने वाले आगरा के अजय राज को राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार–2025 से सम्मानित किया है।

राष्ट्रपति भवन में आयोजित गरिमामय समारोह में जैसे ही अजय राज को सम्मान प्रदान किया गया, ताजनगरी से लेकर पूरे उत्तर प्रदेश तक गर्व की लहर दौड़ गई। अजय की बहादुरी अब केवल एक घटना नहीं, बल्कि साहस, संवेदनशीलता और अदम्य इच्छाशक्ति की जीवंत मिसाल बन चुकी है। यह दिल दहला देने वाली घटना आगरा जिले के बाह क्षेत्र अंतर्गत बासौनी चौकी के पास झरनापुरा हरलालपुर गांव के समीप चंबल नदी की है। गांव निवासी वीरभान (35) एक साधारण किसान हैं, जिनकी जिंदगी खेती और परिवार के सहारे चलती है। शुक्रवार दोपहर वह अपने बेटे अजय और बेटी किरन के साथ नदी से पानी भरने गए थे। जैसे ही वीरभान नदी में उतरे और पानी की बोतल डुबोई, तभी घात लगाए बैठे मगरमच्छ ने अचानक उनके दाहिने पैर पर हमला कर दिया और उन्हें जबड़ों में दबोचकर नदी के भीतर खींचने लगा।

पल भर में हालात बदल गए। पानी में फंसे वीरभान की चीखें गूंजने लगीं। उन्होंने खुद को छुड़ाने की पूरी कोशिश की, लेकिन मगरमच्छ की पकड़ लोहे की जंजीर जैसी मजबूत थी। किनारे खड़े बच्चे भय से कांप उठे, बेटी किरन रोते हुए मदद के लिए चिल्लाने लगी। इसी भयावह क्षण में 9–10 साल के अजय राज ने वह साहस दिखाया, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े लोग भी नहीं कर पाते। अजय ने डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उसने पास पड़ा बबूल का मोटा डंडा उठाया और बिना एक पल गंवाए नदी में कूद पड़ा। मौत से आंख मिलाते हुए अजय ने मगरमच्छ पर ताबड़तोड़ वार शुरू कर दिए। एक-दो नहीं, बल्कि 10 से 12 बार डंडे से प्रहार किए गए। अचानक हुए इस आक्रमण से मगरमच्छ घबरा गया और उसने वीरभान का पैर छोड़ दिया। यही नहीं, मगरमच्छ ने अजय की ओर भी झपट्टा मारा, लेकिन अजय ने फुर्ती और सूझबूझ दिखाते हुए खुद को बचा लिया और बाहर की ओर भाग निकला। कुछ ही क्षणों में वीरभान भी किसी तरह नदी से निकलकर सुरक्षित स्थान पर पहुंच गए।

घटना की खबर फैलते ही आसपास के ग्रामीण मौके पर दौड़े चले आए। मगरमच्छ के हमले से वीरभान के दाहिने पैर में गहरा जख्म हो चुका था और काफी रक्तस्राव हो रहा था। ग्रामीणों ने तत्काल उन्हें बाह के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद हालत गंभीर देखते हुए डॉक्टरों ने आगरा रेफर कर दिया। पिता को अस्पताल तक पहुंचाने वाला अजय गांव के ही स्कूल में चौथी कक्षा का छात्र है। पढ़ाई के साथ-साथ वह खेती में भी पिता का हाथ बंटाता है। मासूम अजय का कहना है कि उसने उस वक्त कुछ नहीं सोचा, बस यही लगा कि अगर वह कुछ नहीं करेगा तो उसके पिता बच नहीं पाएंगे। यही सोच उसे मगरमच्छ के सामने खड़ा कर गई।

जब इस असाधारण साहस की कहानी शासन और प्रशासन तक पहुंची, तो अजय राज को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2025 के लिए चयनित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों सम्मान मिलने के बाद अजय अब केवल अपने गांव या जिले का नहीं, बल्कि पूरे देश का नन्हा नायक बन चुका है। अजय राज की यह कहानी यह संदेश देती है कि सच्चा साहस न उम्र देखता है, न हालात। संकट की घड़ी में उठाया गया एक साहसिक कदम किसी की जिंदगी बचा सकता है। ताजनगरी आगरा का यह बालवीर आज आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन चुका है और पूरे देश को यह सिखा गया है कि हिम्मत हो तो मौत को भी मात दी जा सकती है।

