तलवों पर डंडे बरसाए, दो डंडे टूटे, प्लास से नाखून उखाड़ने की कोशिश, मामला उजागर होने पर जीवनीमंडी चौकी प्रभारी निलंबित, सहयोगी पुलिसकर्मी बचे, किरावली में युवक के पैर तोड़े, छत्ता में दूध विक्रेता को थर्ड डिग्री…
आगरा लाईव न्यूज। आगरा में पुलिस द्वारा की जा रही बर्बर कार्रवाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक ओर किरावली थाने में हत्या का जुर्म कबूल कराने के लिए निर्दोष युवक को पीट-पीटकर उसके दोनों पैर तोड़ दिए गए, लेकिन महीनों बाद भी दोषी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। दूसरी ओर थाना छत्ता क्षेत्र की जीवनीमंडी चौकी में एक दूध विक्रेता युवक को सिर्फ इसलिए अमानवीय थर्ड डिग्री दी गई, क्योंकि उसने ऑटो से पुलिसकर्मियों को थाने तक छोड़ने से मना कर दिया। दोनों घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि पुलिस पर नियंत्रण और जवाबदेही कितनी कमजोर हो गई है।
इससे पहले किरावली थाने का मामला करहरा गांव निवासी राजू पंडित से जुड़ा है। आरोप है कि उसे हत्या के मामले में पूछताछ के नाम पर थाने बुलाया गया और वहां उल्टा लटकाकर तब तक पीटा गया, जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। हालत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसके दोनों पैरों में फ्रैक्चर होने की पुष्टि की। मामला मीडिया में आने के बाद तत्कालीन थानाध्यक्ष नीरज कुमार समेत तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया, लेकिन पीड़ित स्वजन की तहरीर के बावजूद अब तक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है। इससे पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दूसरी घटना थाना छत्ता क्षेत्र की जीवनीमंडी चौकी से सामने आई है। सैंया थाना क्षेत्र के बाग किशोरा वीरई गांव निवासी नरेंद्र कुशवाह अपने भाई धीरज कुशवाह के साथ ई-ऑटो से दूध बेचने का काम करता है। शुक्रवार सुबह करीब 11 बजे दोनों भाई जीवनीमंडी के गरीब नगर इलाके में दूध सप्लाई करने पहुंचे थे। बड़ा भाई धीरज दूध देने चला गया, जबकि नरेंद्र ऑटो पर बैठा रहा। इसी दौरान झगड़े की सूचना पर जीवनीमंडी चौकी प्रभारी रविंद्र कुमार चार पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंचे। कुछ युवकों को पकड़ने के बाद उन्होंने नरेंद्र को आदेश दिया कि वह उन्हें ऑटो से थाना छत्ता तक ले चले। नरेंद्र ने बताया कि वह ऑटो ठीक से नहीं चला पाता। आरोप है कि इस बात पर चौकी प्रभारी नाराज हो गए और मौके पर ही डंडे से उसकी पिटाई शुरू कर दी।
आरोप है कि चौकी के भीतर उसके साथ बुरी तरह मारपीट की गई। उसके पैरों के तलवों पर डंडे मारे गए और अंगूठे का नाखून उखाड़ दिया गया। मारपीट के बाद उसे टेंपो में डालकर थाना छत्ता ले जाया गया और उसके खिलाफ शांतिभंग में चालान कर दिया गया। नरेंद्र का यह भी आरोप है कि इस दौरान चौकी प्रभारी ने उसका मोबाइल फोन और जेब में रखे 1800 रुपये छीन लिए। जमानत के बाद जब वह अपना मोबाइल और रुपये वापस लेने थाने गया तो उसे लौटा नहीं गए। पुलिस की पिटाई के कारण नरेंद्र ठीक से चल भी नहीं पा रहा है और घटना के बाद से भयभीत है। घटना की जानकारी मिलने पर नरेंद्र के भाई ने परिचित रिश्तेदार भाजपा नेता प्रेम सिंह कुशवाह को मामले से अवगत कराया। उन्होंने पुलिस लाइन से नरेंद्र की जमानत कराई।
शनिवार को नरेंद्र अपने भाई और प्रेम सिंह कुशवाह के साथ डीसीपी सिटी कार्यालय पहुंचा और अपने शरीर पर चोटों के निशान दिखाते हुए पूरी घटना बताई। मामले को गंभीरता से लेते हुए डीसीपी सिटी सैय्यद अली अब्बास ने जीवनीमंडी चौकी प्रभारी रविंद्र कुमार को निलंबित कर दिया। उनकी जगह एसआई गौरव राठी को नया चौकी प्रभारी बनाया गया है। डीसीपी सिटी ने विभागीय जांच के आदेश भी दिए हैं और कहा है कि जांच में यदि अन्य पुलिसकर्मियों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि इन दोनों मामलों में कार्रवाई की रफ्तार और स्वरूप को लेकर सवाल बने हुए हैं। किरावली में गंभीर मारपीट के बावजूद मुकदमा दर्ज न होना और जीवनीमंडी में थर्ड डिग्री के बाद सिर्फ निलंबन यह सवाल उठाता है कि क्या पुलिसिया अत्याचार की सजा इतनी ही हल्की रहेगी। आम नागरिक के बीच यह चिंता गहराती जा रही है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो इंसाफ की उम्मीद किससे की जाए।
सवाल जो जवाब मांगते हैं ?
क्या किरावली में युवक के पैर तोड़ने वाले पुलिसकर्मियों पर कभी मुकदमा दर्ज होगा?
क्या जीवनीमंडी चौकी में थर्ड डिग्री देने वाले और साथ देने वाले पुलिसकर्मी सिर्फ निलंबन से बच जाएंगे?
पीड़ितों के मोबाइल और रुपये छीने जाने के आरोपों की जांच कब होगी?
क्या पुलिस विभाग अपने ही लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने का साहस दिखाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या आम आदमी की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाली पुलिस खुद कानून से ऊपर हो चुकी है?

