आगरा लाईव। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया कब किसी को आसमान पर पहुंचा दे और कब जमीन पर पटक दे, यह कहना मुश्किल है। आगरा की महिला आरक्षी प्रियंका मिश्रा के बाद अब कानपुर की बैंक कर्मी आस्था सिंह ट्रॉलिंग के भंवर में फंस गई हैं। वायरल वीडियो, बढ़ते फॉलोअर्स और फिर शुरू हुई तीखी टिप्पणियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सोशल मीडिया की लोकप्रियता मानसिक शांति से बड़ी है? आगरा में तैनात रहीं प्रियंका मिश्रा ने एमएम गेट थाने में पोस्टिंग के दौरान रिवॉल्वर के साथ एक रील बनाई थी। वीडियो वायरल होते ही वह चर्चा में आ गईं।
जहां एक ओर उनके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े, वहीं दूसरी ओर ट्रॉलिंग का सिलसिला भी शुरू हो गया। अधिकारियों ने उन्हें लाइन हाजिर कर दिया। मामला इतना बढ़ा कि अवसाद में आकर प्रियंका ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। सरकार द्वारा प्रशिक्षण पर खर्च की गई राशि की वसूली भी उनसे की गई। बाद में निजी जीवन में भी उतार-चढ़ाव आए। शादी और फिर वैवाहिक विवाद के बाद उन्हें अपनी नौकरी की अहमियत का अहसास हुआ। अधिकारियों से गुहार लगाई तो दोबारा नियुक्ति मिली, लेकिन नियमों के विपरीत होने के कारण दो दिन बाद फिर वर्दी छिन गई। अब कुछ ऐसा ही मामला कानपुर की बैंक कर्मी आस्था सिंह के साथ सामने आया है। सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ। शुरुआत में एक वर्ग ने उनका समर्थन किया और इंस्टाग्राम पर उनके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़कर करीब 16 हजार तक पहुंच गई। लेकिन कुछ ही दिनों में माहौल बदल गया। ट्रॉलिंग का दौर शुरू हुआ और व्यक्तिगत टिप्पणियों का सिलसिला तेज हो गया। मानसिक दबाव इतना बढ़ा कि उन्हें सफाई देनी पड़ी। यहां तक कहना पड़ा कि खुदकुशी जैसा विचार मन में आने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता क्षणिक होती है, लेकिन उसका दुष्प्रभाव लंबे समय तक रहता है। वरिष्ठ मनोरोग चिकित्सक डॉ. केसी गुरनानी का कहना है कि सोशल मीडिया एक आभासी मंच है, जिसे लोग वास्तविक रिश्तों जैसा महत्व देने लगते हैं। ट्रॉलिंग की स्थिति में कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बना लेना बेहतर विकल्प है। किसी विवाद पर प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए, क्योंकि ट्रॉल करने वाले हर बात में कमी निकालते हैं। यदि आत्महत्या जैसे विचार मन में आएं तो तुरंत मनोचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। काउंसलिंग और पारिवारिक संवाद ऐसे समय में सबसे बड़ा सहारा साबित हो सकते हैं। प्रियंका मिश्रा का मामला यह सीख देता है कि आवेश में लिया गया फैसला जीवनभर कचोट सकता है। यदि उन्होंने ट्रॉलिंग से घबराकर इस्तीफा न दिया होता, तो शायद आज भी वर्दी में सेवा दे रही होतीं। आस्था सिंह का मामला भी समाज के लिए चेतावनी है कि सोशल मीडिया की आक्रामक टिप्पणियां किसी की मानसिक स्थिति पर कितना गहरा असर डाल सकती हैं। सोशल मीडिया की दुनिया में लाइक्स और फॉलोअर्स भले ही बढ़ जाएं, लेकिन मानसिक शांति और आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी है। जरूरत इस बात की है कि ट्रॉलिंग को गंभीरता से लिया जाए और प्रभावित व्यक्ति को समय रहते मानसिक सहयोग और सही मार्गदर्शन मिले।

