आगरा लाईव। आगरा में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के बाद से सख्ती, जवाबदेही और पारदर्शिता के दावे बार-बार दोहराए जाते रहे हैं, लेकिन थाना किरावली के मिढ़ाकुर चौकी क्षेत्र की एक घटना ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दसवीं के एक छात्र का हाथ कथित रूप से पुलिस चौकी में तोड़े जाने का मामला न सिर्फ मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या कुछ पुलिसकर्मी खुद को कानून और पुलिस आयुक्त के आदेशों से ऊपर मान बैठे हैं। बताया गया है कि गांव में 18 फरवरी को दो नाबालिगों के बीच हुए विवाद के बाद दोनों पक्षों ने पुलिस से शिकायत की थी। चौकी से दरोगा ने फोन कर दोनों पक्षों को बुला लिया। छात्र उस दिन बोर्ड परीक्षा देकर दोपहर करीब साढ़े बारह बजे घर पहुंचा ही था कि उसे चौकी पर बुला लिया गया। आरोप है कि चौकी पहुंचने पर छात्र को वहीं रोक लिया गया, जबकि परिजनों को घर भेज दिया गया।
परिजनों का आरोप है कि जब पिता दोबारा चौकी पहुंचे तो बेटे को छोड़ने के एवज में 10 हजार रुपये की मांग की गई। आर्थिक असमर्थता जताने पर शाम तक बैठाए रखने की बात कही गई। आरोप और भी गंभीर हैं—चौकी के भीतर डंडों और पट्टों से पिटाई की गई, जिससे छात्र के दाएं हाथ में गंभीर चोट आई। शाम करीब साढ़े सात बजे उसे छोड़ा गया। अगले दिन डॉक्टर को दिखाने पर हाथ में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। सोमवार को उसकी अगली बोर्ड परीक्षा थी—अब सवाल है कि टूटा हाथ लेकर वह परीक्षा कैसे देगा?
कमिश्नरेट पर दाग क्यों?
घटना की जानकारी मिलते ही डीसीपी वेस्ट आदित्य कुमार ने एसीपी अछनेरा शैलेंद्र सिंह से जांच कराई। प्रारंभिक जांच में आरोपों की पुष्टि होने पर दो दरोगाओं को निलंबित कर दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या निलंबन ही पर्याप्त है? क्या इससे पहले भी ऐसी घटनाओं में सिर्फ औपचारिक कार्रवाई कर मामला ठंडे बस्ते में नहीं डाल दिया गया? कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के बाद दावा किया गया था कि पुलिस जवाबदेह होगी, अनुशासन कड़ा होगा और जनता का विश्वास मजबूत होगा। लेकिन जमीनी हकीकत में कुछ पुलिसकर्मियों की कार्यशैली पूरे महकमे की छवि को धूमिल कर रही है। इससे पहले भी मारपीट, वसूली और अभद्र व्यवहार के आरोपों में पुलिस पर उंगली उठती रही है। हर बार जांच, निलंबन और फिर वही चक्र—लेकिन क्या व्यवस्था में स्थायी सुधार हो पाया?
क्या पुलिस आयुक्त के आदेशों की उड़ रही धज्जियां?
पुलिस आयुक्त कार्यालय से समय-समय पर स्पष्ट निर्देश जारी होते रहे हैं कि थानों और चौकियों में किसी भी नागरिक, खासकर नाबालिगों के साथ संवेदनशील और कानूनसम्मत व्यवहार किया जाए। लेकिन यह घटना दर्शाती है कि कुछ पुलिसकर्मी इन आदेशों को गंभीरता से नहीं ले रहे। क्या उन्हें भरोसा है कि अंततः विभागीय कार्रवाई से बच निकलेंगे? या फिर यह मान लिया गया है कि स्थानीय स्तर पर सब “मैनेज” हो जाएगा? अगर एक बोर्ड परीक्षार्थी को चौकी में रोककर कथित तौर पर पीटा जाता है और पैसे की मांग की जाती है, तो यह सिर्फ एक परिवार के साथ अन्याय नहीं, बल्कि कानून के शासन पर सीधा प्रहार है। यह घटना बताती है कि सुधार की घोषणाएं पर्याप्त नहीं, सख्त और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है।
ठोस कार्रवाई कब?
जनता का सवाल साफ है—क्या निलंबन के बाद निष्पक्ष आपराधिक मुकदमा दर्ज होगा? क्या पीड़ित छात्र को न्याय और मुआवजा मिलेगा? क्या दोषी पाए जाने पर सेवा से बर्खास्तगी जैसी कड़ी कार्रवाई होगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या कमिश्नरेट पुलिस यह सुनिश्चित कर पाएगी कि भविष्य में कोई छात्र, कोई गरीब परिवार चौकी के भीतर डर और अपमान का शिकार न हो? आगरा कमिश्नरेट की साख दांव पर है। एक-एक घटना पूरे महकमे की छवि तय करती है। अगर कुछ पुलिसकर्मी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं, तो यह भ्रम तोड़ना नेतृत्व की जिम्मेदारी है। वरना “जनता का मित्र” कहलाने वाली पुलिस पर जनता का भरोसा दरकता जाएगा—और कानून के रखवालों पर ही कानून तोड़ने के आरोप लगते हैं।

